सूरत के खाजोद पश्चिम साइट पर भीषण आग, या फिर सबूत मिटाने की साज़िश? SMC और ठेकेदार की मिलीभगत पर उठे सवाल।

रिपोर्टर:- कल्पेश धमेलिया, कामरेज, सूरत

सूरत: सूरत के खाजोद में कचरा निस्तारण स्थल पर लगी भीषण आग ने अब राजनीतिक और प्रशासनिक मोर्चों पर भी हलचल मचा दी है। क्या यह आग महज़ एक दुर्घटना है, या फिर 5000 टन कचरे के अवैध निस्तारण के सबूतों को मिटाने की एक सोची-समझी साज़िश? ऐसे गंभीर आरोपों के साथ, नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सूरत नगर निगम (SMC) के कमिश्नर और गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (GPCB) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

जांच के नाम पर ‘ड्रामा’ और अधिकारियों की निष्क्रियता

मिली जानकारी के अनुसार, CD ट्रांसपोर्ट एजेंसी द्वारा हज़ारों टन ठोस कचरे के अवैध निस्तारण की घटना के बाद, डिप्टी म्युनिसिपल कमिश्नर की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन किया गया था। हालांकि, हैरानी की बात यह है कि 3 महीने बीत जाने के बाद भी, इस समिति ने अभी तक घटनास्थल का दौरा तक नहीं किया है। इस देरी के चलते, अब यह चर्चा ज़ोरों पर है कि ठेकेदार ने असहयोग का रवैया अपना लिया है और अधिकारियों पर उसका नियंत्रण खत्म हो चुका है।

करोड़ों के बिल पास करवाने के लिए आगज़नी का शक

स्थानीय लोगों और जागरूक नागरिकों का आरोप है कि: यह आग जान-बूझकर इसलिए लगाई गई है ताकि बिना प्रोसेस किए गए कचरे के सबूतों को मिटाया जा सके। इस आग के पीछे का मकसद ठेकेदार के 100 करोड़ रुपये से अधिक के लंबित बिलों को आसानी से पास करवाना हो सकता है। पहले CCTV फुटेज के आधार पर जांच की मांग किए जाने के बावजूद, म्युनिसिपल कमिश्नर ने पुलिस जांच नहीं करवाई, जिसके परिणामस्वरूप आज यह गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है।

ज़हरीले धुएं से जन-स्वास्थ्य खतरे में: खाजोद में लगी आग के कारण लाखों टन कचरा जल रहा है, जिससे सूरत शहर के AQI (वायु गुणवत्ता सूचकांक) में भारी उछाल आया है। इस ज़हरीले धुएं के कारण, बुज़ुर्गों और बच्चों में सांस लेने में दिक्कत, खांसी और एलर्जी के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। पर्यावरणविद इस बात से नाराज़ हैं कि GPCB ने अभी तक कोई भी सख्त कार्रवाई नहीं की है।

नागरिकों की मुख्य मांगें:

* ACB जांच: अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से चल रहे इस ‘कचरा घोटाले’ की जांच एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) द्वारा की जानी चाहिए।
* ब्लैकलिस्ट करना: इस घटना के लिए ज़िम्मेदार एजेंसी को तत्काल प्रभाव से ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए और उसके सभी भुगतानों को रोक दिया जाना चाहिए। * ​कानूनी कार्रवाई: SMC कमिश्नर और ज़िम्मेदार अधिकारियों के ख़िलाफ़ पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और वायु अधिनियम, 1981 के तहत मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
* ​पुलिस जाँच: आग लगने के असली कारणों का पता लगाने के लिए एक निष्पक्ष पुलिस जाँच की जानी चाहिए।

​”अगर प्रशासन इसी तरह ढिलाई बरतता रहा या मामले पर पर्दा डालने की कोशिश करता रहा, तो इस मामले में हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की भी चेतावनी दी गई है।”

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Author: vatsalyanews

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