मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को एक बार फिर पार्टी से निष्कासित कर दिया है। आकाश आनंद को पार्टी और उनके पद वापस देने के लिए एक शर्त रखी गई थी, जिसे पूरा भी किया गया, लेकिन इसके बावजूद मायावती ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। इस फैसले के पीछे परिवार और पार्टी के भीतर चल रही खींचतान की चर्चा भी सामने आ रही है। ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। इस दौरान कार्यक्रम में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री और राजनीतिक विश्लेषक शांतनु गुप्ता मौजूद रहे।
बसपा में कलह का किसे मिलेगा फायदा
चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती और बसपा की भूमिका अब भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। अगर मायावती पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूती से चुनाव लड़ती हैं तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान समाजवादी पार्टी को हो सकता है। वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश में बसपा के मजबूत होने से बीजेपी के लिए चुनौती बढ़ सकती है। यही वजह है कि यूपी चुनाव में बसपा की सक्रियता का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकता है।
बसपा का सपा और कांग्रेस के साथ हो चुका है गठबंधन
बसपा को कांशीराम ने एक मिशन के रूप में खड़ा किया था। डीएस4 और दूसरे संगठनों के जरिए उन्होंने संगठन तैयार किया और गांव-गांव जाकर मिशन का संदेश पहुंचाया। इसके बाद 1993 में समाजवादी पार्टी के साथ बसपा का प्री-पोल गठबंधन हुआ। उस समय दलित और पिछड़े वर्ग का बड़ा राजनीतिक समीकरण तैयार हुआ, लेकिन दोनों दल बहुमत हासिल नहीं कर सके। इसके बाद बसपा ने कांग्रेस के साथ भी गठबंधन किया। गेस्ट हाउस कांड के बाद समाजवादी पार्टी और बसपा के रिश्तों में गहरी दरार आई। बाद में 2019 में दोनों दलों के बीच गठबंधन हुआ, लेकिन तब तक राजनीतिक परिस्थितियां काफी बदल चुकी थीं।
मायावती की राजनीति पर सवाल
मायावती की राजनीति को लेकर एक सवाल यह भी उठता रहा है कि पार्टी में उनके साथ लंबे समय तक कोई नेता क्यों नहीं टिक पाया। चर्चा में कांशीराम के दौर के कई सहयोगियों से लेकर बाद के नेताओं तक के नाम आते हैं, जो धीरे-धीरे पार्टी से अलग होते गए। इसके साथ ही पार्टी में कोऑर्डिनेटर व्यवस्था मजबूत हुई और फैसलों का केंद्रीकरण बढ़ता गया।
बसपा का वोट प्रतिशत भी पिछले चुनावों में लगातार घटा है। 2019 में पार्टी को लगभग 20 प्रतिशत वोट मिला था, जो 2022 में करीब 13 प्रतिशत और 2024 में लगभग साढ़े पांच प्रतिशत तक पहुंच गया। चर्चा के मुताबिक अब पार्टी के पास मुख्य रूप से जाटव वोट का कोर आधार बचा है, जबकि गैर-जाटव दलित वोट अलग-अलग दलों की ओर चला गया है।
आकाश आनंद को लेकर भी सवाल
आकाश आनंद को लेकर भी यही सवाल है कि क्या वह कांशीराम की शुरुआती राजनीति और आक्रामक भाषा की ओर लौटना चाहते हैं, जबकि मायावती सर्वसमाज की राजनीति को सत्ता हासिल करने के लिए ज्यादा प्रभावी मानती हैं। 2007 में सर्वसमाज को साथ लेकर ही बसपा ने बहुमत की सरकार बनाई थी।
इसके बावजूद बसपा की संभावनाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। पार्टी को उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तराखंड, हरियाणा और दक्षिण के कुछ राज्यों में भी वोट मिलता रहा है। ऐसे में आने वाले चुनाव में बसपा कुछ क्षेत्रों में त्रिकोणीय मुकाबला बनाने की स्थिति में हो सकती है। हालांकि यह काफी हद तक उम्मीदवारों और पार्टी के चुनाव लड़ने के तरीके पर निर्भर करेगा।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
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