कांग्रेस पार्टी की मौजूदा राजनीति में मुस्लिम वोट को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ में इसी मुद्दे पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी और कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाए गए। इस दौरान कार्यक्रम में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता और वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय मौजूद रहे। चर्चा में कहा गया कि कांग्रेस जिस तरीके से मुस्लिम वोट को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है, वह उत्तर प्रदेश तक सीमित है या फिर 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर बनाई गई लंबी रणनीति का हिस्सा है।
वंदे मातरम विवाद को लेकर हुई चर्चा
बहस का एक बड़ा मुद्दा वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस का रुख रहा। चर्चा में कश्मीर के एक कार्यक्रम का उदाहरण दिया गया, जहां मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला और उनकी कैबिनेट की मौजूदगी में वंदे मातरम और राष्ट्रगान हुआ। इसके बाद कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल की ओर से पूरा वंदे मातरम नहीं गाए जाने को लेकर दिए गए तर्क पर सवाल उठाए गए। उनके अनुसार, वंदे मातरम का पूर्ण संस्करण भारत के बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष चरित्र से मेल नहीं खाता और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा स्वीकार किए गए संस्करण को ही गाया जाना चाहिए।
इसी को लेकर चर्चा में कांग्रेस के पुराने रुख और आज की राजनीति के बीच संबंध तलाशने की कोशिश की गई। आरोप लगाया गया कि कांग्रेस मुस्लिम वोट को अपने साथ रखने के लिए लगातार ऐसी राजनीति करती रही है। चर्चा में नेहरू, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक की राजनीतिक सोच और फैसलों को एक क्रम के रूप में जोड़कर देखा गया।
यूपी चुनाव को लेकर भी हुई चर्चा
उत्तर प्रदेश की राजनीति को लेकर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि कांग्रेस का लक्ष्य केवल बीजेपी से मुकाबला करना नहीं है, बल्कि उन क्षेत्रीय दलों से मुस्लिम वोट वापस लेना भी है, जो लंबे समय से इस वोट बैंक का बड़ा हिस्सा अपने साथ रखते आए हैं। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों के लिए इसे खतरे की घंटी बताया गया। तर्क दिया गया कि अगर कांग्रेस के पास मुस्लिम वोट का एक मजबूत आधार बनता है तो वह बीजेपी के खिलाफ खुद को अधिक मजबूती से खड़ा कर सकती है।
इसी क्रम में कांग्रेस की चुनावी रणनीति में दलित और मुस्लिम समीकरण का भी जिक्र हुआ। राहुल गांधी के ‘जय भीम’ कहने और दलित वोट की तरफ बढ़ने की कोशिशों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम और दलित समीकरण को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
राहुल गांधी की राजनीतिक शैली पर हुई चर्चा
चर्चा में राहुल गांधी की राजनीतिक शैली और उनके सलाहकारों पर भी सवाल उठे। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि उनके आसपास ऐसे लोग हैं, जिनकी विचारधारा और सलाह कांग्रेस की वर्तमान दिशा को प्रभावित करती है। यह भी कहा गया कि राहुल गांधी कई बार अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक रुख अपनाते दिखाई देते हैं—कभी धार्मिक पहचान से जुड़ी तस्वीरें सामने आती हैं, तो कभी मुस्लिम वोट और वामपंथी विचारों से जुड़ी राजनीति दिखाई देती है।
कुल मिलाकर बहस का केंद्र कांग्रेस की मुस्लिम वोट रणनीति, वंदे मातरम को लेकर उसका रुख और उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के साथ संभावित प्रतिस्पर्धा रहा। सवाल यही उठाया गया कि कांग्रेस की यह रणनीति उसे राजनीतिक लाभ दिलाएगी या फिर उसके सहयोगी और क्षेत्रीय दल ही इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
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