क्या डाक विभाग की लापरवाही प्रिंट मीडिया और साहित्य जगत के लिए ‘मौत की घंटी’ है? जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग

वात्सल्यम समाचार,

पूजा ठक्कर – मुंडारा कच्छ.

क्या पोस्टल डिपार्टमेंट की लापरवाही प्रिंट मीडिया और लिटरेचर की दुनिया के लिए ‘मौत की घंटी’ जैसी है? ज़िम्मेदार लोगों पर एक्शन लेने की मांग

रातड़िया, तारीख 25: इंडियन पोस्टल डिपार्टमेंट की बड़ी लापरवाही की वजह से आज ग्रामीण भारत का सामाजिक और बौद्धिक ढांचा खतरे में है। रातड़िया के जलाराम सखी मंडल की प्रेसिडेंट तितिक्षाबेन प्रकाश चंद्र ठक्कर ने गुस्से में कहा है कि प्राइवेट न्यूज़ एजेंसियां ​​अभी भी भारत के 50% से ज़्यादा गांवों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे इलाकों में रहने वाले हज़ारों सीनियर सिटिज़न्स के लिए पोस्ट के ज़रिए आने वाले अखबार और सामाजिक-धार्मिक मैगज़ीन ही सहारे का एकमात्र ज़रिया हैं। लेकिन पोस्टल डिपार्टमेंट के कर्मचारी इस लिटरेचर को पढ़ने वालों तक पहुंचाने के बजाय इसे कचरे के ढेर में बदल रहे हैं जो सच में प्रेस की दुनिया और लिटरेचर के लिए ‘मौत की घंटी’ है।

तितिक्षाबेन ने आगे कहा कि टेलीकॉम कंपनियों ने कीमतें बढ़ाकर आम आदमी पर आर्थिक बोझ बढ़ा दिया है, वहीं मिडिल क्लास और बुज़ुर्ग फिर से प्रिंट मीडिया की तरफ मुड़ गए हैं। ऐसे में सरकार को उन पोस्टमैन की बात अनसुनी कर देनी चाहिए जो “हम सिंपल मेल के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं” जैसा ढुलमुल जवाब दे रहे हैं। यह सिर्फ़ पेपर डिलीवरी का सवाल नहीं है, बल्कि एक पीढ़ी के ज्ञान और सालों की परंपरा का सवाल है। अगर लाइफटाइम सब्सक्रिप्शन देने वाले कस्टमर्स का लिटरेचर पोस्ट ऑफिस में बेचा जाएगा, तो गांव की संस्कृति और ज्ञान का सोर्स सूख जाएगा।

सखी मंडल ने मांग की है कि हर पोस्ट ऑफिस में ‘सुझाव बॉक्स’ ज़रूरी किया जाए और गैर-ज़िम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ़ सख्त सज़ा वाली कार्रवाई की जाए। अगर इस सिस्टम में सुधार नहीं हुआ, तो प्रिंट मीडिया के वजूद को बचाने के लिए आगे बुज़ुर्गों और गांव की जनता के साथ मिलकर मज़बूत आवाज़ उठाई जाएगी।

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Author: vatsalyanews

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