सामंथा की हुई ‘कला आवरण’ रस्म, जानें क्या है ये परंपरा और कैसे जाग्रत किए जाते हैं मां के 7 चक्र

जल्द मां बनने वाली एक्ट्रेस सामंथा रूथ ने इंस्टाग्राम पर अपनी ‘कला आवरण’ रस्म की बेहद खूबसूरत तस्वीरें शेयर की हैं। तस्वीरों में सामंथा को शुद्ध फूलों वाले जल से स्नान कराया जा रहा है और मंत्रोच्चार किया जा रहा है। एक्ट्रेस ने इस रस्म के बारे में खास जानकारी भी अपने फैंस के साथ शेयर की है। सच कहें तो ज्यादातर लोग इस रस्म के बारे में नहीं जानते हैं। आइये जानते हैं क्या होती है कला आवरण रस्म जिसे मां बनने से पहले पूरा किया जाता है?

क्या है कला आवरण?

सामंथा ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए इस रस्म के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने लिखा है कि वो हमेशा से परंपराओं की ओर आकर्षित रही हैं, भले ही वह उन्हें पूरी तरह से समझ न पाई हों। हर अनुष्ठान दिखने से कहीं परे होता है। उसके मंत्रों में, जप में, और जिस तरह से ये प्रथाएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं, उसमें कुछ न कुछ अंतर्निहित है। कला आवरण जिसे लोग श्री कल्पम के नाम से भी जानते हैं एक श्रीविद्या परंपरा का एक खास अनुष्ठान है। इसमें होने वाली मां के सात चक्रों के ज़रिए देवी की 94 कलाओं और उनके कई दिव्य गुणों का सम्मान किया जाता है। इन केंद्रों को पवित्र जल और मंत्रों से शुद्ध और ऊर्जावान बनाया जाता है, ताकि चेतना की जीवंत उपस्थिति उनमें प्रवाहित हो सके।

गर्भवती महिला को माना जाता है देवी समान

एक्ट्रेस ने बताया कि उन्हें इस रस्म के दौरान हर मंत्र, हर भेंट और हर कदम के पीछे एक खास मकसद महसूस हुआ। इसमें कुछ भी बिना वजह नहीं था। कला आवरण की रस्म में गर्भवती महिला को देवी के समान माना जाता है। उसे उस महिला के रूप में सम्मान दिया जाता है, जिसके जरिए एक नए जीवन का जन्म होने वाला है। सामंथा ने बताया कि यह रस्म सिर्फ बच्चे के लिए ही नहीं, बल्कि मां के लिए भी एक आशीर्वाद जैसा अनुभव है। इस दौरान महिला खुद भी जिंदगी के एक नए पड़ाव में प्रवेश करती है और एक नए रूप में जन्म लेती है।

श्री चक्र यंत्रम के केन्द्र में बैठाया जाता है 

अभिषेक, स्नान के बाद गर्भवती महिला को श्री चक्र यंत्रम के ठीक बीच में बैठाया जाता है। यह एक ज्यामितीय आकृति है जो श्रीविद्या पूजा का केंद्र है। अगर आपने इसे कभी देखा है, तो यह आपस में जुड़े त्रिभुजों से बना होता है, जिन्हें नौ आवरणों में व्यवस्थित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये आवरण आध्यात्मिक यात्रा के अलग-अलग चरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ठीक केंद्र में बिंदु स्थित होता है, जो पूरी सृष्टि के उद्गम बिंदु का प्रतीक है और इस परंपरा में, यह स्वयं देवी ललिता त्रिपुरासुंदरी का आसन है। जब माता वहां बैठी होती हैं, तब पुजारी देवी खड्गमाला नामक एक लंबी, स्तरित प्रार्थना का पाठ करते हैं, जिसमें उन नौ कक्षों से जुड़े देवी-देवताओं और दिव्य शक्तियों के नाम लिए जाते हैं। यह प्रार्थना सबसे बाहरी परत से केंद्र की ओर बढ़ती है, जो प्रतीकात्मक रूप से मन को भीतर की ओर, शांति की ओर और सुरक्षा की ओर ले जाती है। 

जन्म से पहले बच्चे का संस्कार

जैसा कि समंथा ने बताया है ये मान्यता है कि इस सभी मंत्रोच्चार से मां और बच्चे दोनों के चारों ओर एक तरह का सुरक्षात्मक एरिया बनता है और बच्चे को जन्म से पहले ही एक संस्कार, एक आध्यात्मिक छाप मिलती है। जब वो इस परंपरा के लिए शामिल हुईं तो उन्हें इसके बार में इतना पता नहीं था, लेकिन अब वो अपने आपको धन्य महसूस कर रही हैं।

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Author: vatsalyanews

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