सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को RTE के तहत 25% आरक्षण को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के बच्चों के शिक्षा के अधिकार पर एक बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस पी.एम. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने साफ किया कि प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए 25% रिज़र्वेशन के नियम को असरदार तरीके से लागू करना केंद्र और राज्य सरकारों की पहली ज़िम्मेदारी है।

यह सुनवाई एक पिता की अर्जी पर हुई, जिसके बच्चों को 2016 में मुंबई के एक पड़ोस के स्कूल में सीटें होने के बावजूद एडमिशन नहीं मिला था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने ऑनलाइन प्रोसेस का पालन न करने के आधार पर अर्जी खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हाई कोर्ट के रुख की आलोचना की और बच्चों के पक्ष में फैसला सुनाया।

आर्टिकल 38 के तहत, सरकारों को NCPCR और चाइल्ड राइट्स कमीशन से सलाह करके साफ और आसान नियम बनाने चाहिए। बच्चों को एडमिशन दिलाना सिर्फ माता-पिता की नहीं, बल्कि लोकल अथॉरिटी और सरकार की ज़िम्मेदारी है। कोर्ट को भी ऐसे सेंसिटिव मामलों में टेक्निकल दिक्कतों को देखने के बजाय माता-पिता को जल्दी राहत देने के लिए “एक कदम और आगे” बढ़ना चाहिए। कोर्ट ने यह कहते हुए अपनी बात खत्म की कि अगर सही और सख्त नियम नहीं बनाए गए, तो संविधान के आर्टिकल 21A (शिक्षा का अधिकार) का मकसद ही खत्म हो जाएगा। प्रैक्टिकल रुकावटों पर कोर्ट की टिप्पणी कोर्ट ने माना कि कानून कागज़ पर होने के बावजूद, गरीब माता-पिता के लिए एडमिशन मिलना मुश्किल है। इसके मुख्य कारण इस तरह हैं: डिजिटल निरक्षरता: गरीब माता-पिता के लिए ऑनलाइन अप्लाई करने का प्रोसेस मुश्किल है। जानकारी की कमी: सीटें कहाँ खाली हैं या हेल्पडेस्क जैसी सुविधाओं की कमी। भाषा की रुकावट: मुश्किल नियम और प्रोसेस आम आदमी की समझ से बाहर हैं।

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Author: vatsalyanews

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