श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) में नरेंद्र मोदी की स्पीच ने उनके राजनीतिक ‘मोजो’ की वापसी की बहस को फिर हवा दे दी है। बीजेपी के सामने हाल के महीनों में युवाओं से कनेक्ट और संगठनात्मक स्तर पर कुछ चुनौतियां जरूर उभरी हैं, लेकिन पार्टी का कोर वोटर अभी भी पूरी तरह उससे दूर नहीं हुआ है। अब नजर उत्तर प्रदेश पर है, जहां मोदी की लोकप्रियता, योगी आदित्यनाथ की पकड़ और बीजेपी के खिलाफ स्थानीय नाराजगी तीनों की परीक्षा होगी। ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ में इस बार चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस अंदाज की रही, जिसे लेकर सवाल उठ रहा है कि क्या उनका पुराना करिश्मा यानी ‘मोजो’ फिर लौट आया है।
12 साल सत्ता के बाद भी नरेंद्र मोदी का जादू बरकरार?
कार्यक्रम में मेहमानों ने नरेंद्र मोदी की हालिया SRCC स्पीच की तुलना 2013 की उनकी चर्चित स्पीच से की। उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष में रहते हुए तत्कालीन सरकार के खिलाफ माहौल को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहे थे। इस दौरान कार्यक्रम में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार अजीत द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री और राजनीतिक विश्लेषक सज्जन कुमार मौजूद रहे।
मेहमानों के मुताबिक, 2013 और आज की स्थिति में बड़ा अंतर यह है कि उस समय नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में नहीं थी, जबकि अब उनके 12 साल के शासन का प्रदर्शन जनता के सामने है। इसलिए आज का भाषण उनके पुराने वादों और विजन के साथ-साथ उनके कामकाज के आधार पर भी परखा जाता है।
युवाओं से दोबारा कनेक्ट करने की कोशिश
चर्चा में कहा गया कि पिछले कुछ महीनों में बीजेपी और केंद्र सरकार के लिए माहौल उतना अनुकूल नहीं रहा। खासतौर पर युवाओं के बीच असंतोष और कनेक्ट में गैप की बात सामने आई। इसके बाद प्रधानमंत्री की ओर से युवाओं से सीधे जुड़ने की कोशिश दिखाई दी।
जंतर-मंतर के बाद प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया वीडियो, युवाओं से अपील और सीधे संवाद को इसी रणनीति का हिस्सा बताया गया। पार्टी और मंत्रियों को भी युवाओं के साथ कनेक्ट बढ़ाने के निर्देश दिए जाने की चर्चा हुई। SRCC कार्यक्रम में छात्रों की प्रतिक्रिया को इसी प्रयास का महत्वपूर्ण संकेत माना गया।
वडोदरा के कार्यक्रम का उदाहरण भी सामने आया, जहां ऑनलाइन पोर्टल के जरिए एक घंटे में सभी सीटें भरने और बड़ी संख्या में लोगों के वेटिंग में होने की बात कही गई। इसके अलावा युवाओं पर केंद्रित कई और कार्यक्रम आयोजित किए जाने की चर्चा हुई।
असली टेस्ट यूपी चुनाव में
कार्यक्रम में कहा गया कि दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव जैसे युवा-केंद्रित चुनाव कुछ संकेत दे सकते हैं, लेकिन असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में होगी। वजह यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश से सांसद हैं और लोकसभा में भी राज्य का महत्व बेहद बड़ा है। ऐसे में यूपी चुनाव में मोदी और योगी, दोनों के राजनीतिक प्रभाव की परीक्षा होगी। चर्चा में यह भी कहा गया कि सीएम योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता में बड़ी गिरावट दिखाई नहीं देती, लेकिन बीजेपी को लेकर पहले जैसा उत्साह जरूर कम हुआ है। लोगों के बीच यह धारणा जरूर बनी हुई है कि बीजेपी जीत सकती है, लेकिन जीत को लेकर पहले जैसा उत्साह नहीं दिख रहा।
BJP के सामने संगठन और एंटी-इनकंबेंसी की चुनौती
मेहमानों ने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद पार्टी के भीतर आए बदलावों पर भी बात की। नेताओं द्वारा अपनी अगली पीढ़ी को राजनीति में आगे बढ़ाने, टिकट को लेकर आशंकाओं और कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती दूरी को लेकर चिंता जताई गई। सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद नेताओं और कार्यकर्ताओं में ‘सेंस ऑफ एंटाइटलमेंट’ आने की बात कही गई। उत्तर प्रदेश में नौकरशाही और निचले स्तर के संगठन के बीच कथित गठजोड़ को भी एक चुनौती बताया गया। हालांकि, चर्चा में यह भी कहा गया कि बीजेपी के कोर वोटर के सामने फिलहाल मजबूत विकल्प की कमी है। समाजवादी पार्टी को लेकर बीजेपी के परंपरागत वोटर के एक हिस्से में सहजता नहीं होने की बात भी सामने आई।
राहुल गांधी और अखिलेश यादव की अपनी-अपनी रणनीति
कार्यक्रम में राहुल गांधी की राजनीति और उनके दलित-ओबीसी केंद्रित फोकस पर भी चर्चा हुई। मेहमानों के मुताबिक, राहुल गांधी की रणनीति में जाति जनगणना, आरक्षण और ‘जितनी आबादी उतना हक’ जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। युवाओं के बीच शिक्षा, परीक्षा, नौकरी और रोजगार के मुद्दों को लेकर भी कांग्रेस की ओर से अभियान चलाने की बात कही गई।
वहीं, अखिलेश यादव की रणनीति में पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर विशेष फोकस की चर्चा हुई। जाट और गैर-जाट समीकरण, मुस्लिम वोट और क्षेत्रीय सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश को उनकी रणनीति का हिस्सा बताया गया। जयंत चौधरी को लेकर दिए गए ‘चवन्नी’ वाले बयान को लेकर भी चर्चा हुई और इसे अनावश्यक टिप्पणी बताया गया।
योगी के लिए क्या कहता है यूपी का माहौल?
चर्चा के अंत में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की स्थिति पर भी बात हुई। मेहमानों के मुताबिक, बीजेपी से नाराजगी के बावजूद मुख्यमंत्री योगी का ग्राफ नीचे जाता हुआ नहीं दिख रहा। यहां तक कहा गया कि बीजेपी से नाराजगी का फायदा भी कुछ हद तक योगी को मिल सकता है, क्योंकि उन्हें बीजेपी के भीतर ही एक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।
ब्राह्मण वोट को लेकर भी चर्चा हुई। इसमें कहा गया कि ब्राह्मणों में नाराजगी या रूठने की भावना हो सकती है, लेकिन बीजेपी से पूरी तरह दूर जाने की स्थिति दिखाई नहीं देती। राजपूत वोट के बीजेपी और योगी के साथ बने रहने की बात भी कही गई। कुल मिलाकर ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ की चर्चा में सवाल यही रहा कि क्या नरेंद्र मोदी युवाओं के बीच अपना पुराना कनेक्ट और करिश्मा वापस हासिल कर पाए हैं। SRCC में मिला रिस्पॉन्स इस दिशा में एक संकेत जरूर माना गया, लेकिन इसका अंतिम जवाब चुनावी नतीजे ही देंगे। खासकर उत्तर प्रदेश का चुनाव यह तय करने में अहम होगा कि मोदी और योगी का प्रभाव कितना बरकरार है और बीजेपी के खिलाफ दिख रही नाराजगी वोट में कितनी बदलती है।
डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिए गए वीडियो पर क्लिक करें।
(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)









