खेतों में 100 फीट से ज़्यादा चौड़े ‘सिंकहोल’ बन रहे हैं!

धरती ग्लोबल वार्मिंग के ऐसे नतीजों से जूझ रही है जो पहले कभी नहीं हुए। सबसे नया एनवायरनमेंटल संकट तुर्की में पैदा हुआ है। तुर्की के ‘अनाज के भंडार’ कहे जाने वाले खेती-बाड़ी वाले इलाके ‘कोन्या’ की उपजाऊ मिट्टी में बड़े-बड़े सिंकहोल बनने लगे हैं। ऐसे सिंकहोल, जिन्हें तुर्की में ‘ओब्रुक’ और इंग्लिश में ‘सिंकहोल’ कहते हैं, उनकी संख्या पाँच या दस नहीं, बल्कि 700 है! जिनमें से कई 100 फीट से ज़्यादा चौड़े और सैकड़ों फीट गहरे हैं। ऐसे सिंकहोल अचानक खेतों, सड़कों और गाँवों में बन जाते हैं। जो ज़मीन एक पल में सही-सलामत लगती थी, वह अचानक ढह जाती है, जिससे न सिर्फ़ खेती-बाड़ी के सामान बर्बाद हो रहे हैं, बल्कि गाँव वालों की जान भी खतरे में पड़ रही है। आइए समझते हैं कि सिर पर तलवार की तरह लटके इस ‘ओब्रुक’ का क्या कारण है।

इस समस्या का मुख्य कारण ग्राउंडवाटर का बहुत ज़्यादा और बिना कंट्रोल के पंपिंग है। कोन्या के मैदानों में गेहूं, चुकंदर और मक्का जैसी फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं। इन सभी फसलों को उगाने के लिए बहुत ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है। हाल के सालों में, तुर्की में बारिश की मात्रा कम हो गई है, जिसकी वजह से यहाँ की खेती ग्राउंडवॉटर पर निर्भर हो गई है। किसान पानी पाने के लिए गहरे से गहरे कुएँ खोदकर पानी निकाल रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, इस इलाके में 100,000 से ज़्यादा कुएँ हैं, जिनमें से कई गैर-कानूनी हैं। बहुत ज़्यादा पंपिंग की वजह से ग्राउंडवॉटर लेवल बहुत ज़्यादा गिर गया है। एक अनुमान के मुताबिक, 10 मीटर से भी ज़्यादा नीचे।

कोन्या इलाके के नीचे की ज़मीन ज़्यादातर ‘कार्स्ट लैंडस्केप’ है, जिसका मतलब है कि यह चूना पत्थर और नरम चट्टानों से बनी है, जो पानी के संपर्क में आने पर आसानी से घुल जाती हैं। जब ग्राउंडवॉटर लेवल ज़्यादा होता है, तो ये चट्टानें पानी में डूबी और स्थिर रहती हैं। लेकिन जब बहुत ज़्यादा पंपिंग की वजह से पानी का लेवल गिरने लगता है, तो ज़मीन के नीचे खाली जगहें (गुफाएँ) बनने लगती हैं। जैसे ही गुफा के ऊपर की मिट्टी और मिट्टी का वज़न ‘पानी से कमज़ोर’ होता है, उसका दबाव गुफा पर पड़ने लगता है, जिससे ज़मीन अचानक नीचे खिसककर एक बड़ा, गहरा सिंकहोल बन जाता है।

हाल के सालों में सिंकहोल की संख्या में बहुत ज़्यादा बढ़ोतरी हुई है। पहले, हर साल एक सिंकहोल होता था, लेकिन अब हर साल पंद्रह से बीस सिंकहोल हो गए हैं। पिछले एक साल में ही 20 से ज़्यादा नए सिंकहोल बन गए हैं। ये सिर्फ़ खेतों में ही नहीं, बल्कि सड़कों और रिहायशी इलाकों में भी गिरने लगे हैं, जिससे न सिर्फ़ लोगों की रोज़ी-रोटी बल्कि जानवरों और पशुधन की रोज़ी-रोटी पर भी खतरा पैदा हो गया है।

इस संकट का सीधा असर स्थानीय किसानों पर पड़ा है। कई किसानों की खेतों में सूखे की वजह से पूरी फसल बर्बाद हो गई है। अब किसानों को खेतों में ट्रैक्टर चलाते समय भी ज़मीन धंसने का डर सताता रहता है। खेती लायक ज़मीन खत्म होने से उनकी रोज़ी-रोटी खतरे में है। धरती, जिसे माँ कहा जाता है, अब अपने बेटों को निगलने लगी है, कितनी बड़ी गड़बड़ी है!

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Author: vatsalyanews

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