एक तरफ ‘कुपोषण-मुक्त गुजरात’ के नारे लग रहे हैं, वहीं गुजरात में कुपोषण की स्थिति चिंताजनक हो गई है। कुपोषण के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन टारगेट पूरा नहीं हुआ है। केंद्र सरकार ने खुद बताया है कि गुजरात में पांच साल से कम उम्र के 3.21 लाख बच्चे कुपोषित हैं। इससे गुजरात में कुपोषण की गंभीर स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
कुपोषण को कंट्रोल करने के लिए जननी सुरक्षा योजना, कस्तूरबा पोषण सहाय योजना, प्रधानमंत्री मातृ सुरक्षा अभियान, प्रधानमंत्री मातृवंदना योजना, कुपोषण-मुक्त गुजरात समेत 10 से ज़्यादा योजनाएं लागू की जा रही हैं, लेकिन पंचमहल और दाहोद समेत आदिवासी-पिछड़े इलाकों में कुपोषण का लेवल नहीं सुधरा है।
संसद में केंद्र सरकार की पेश रिपोर्ट से यह नतीजा निकला है कि जून 2025 तक गुजरात में कम लंबाई वाले आदिवासी नवजात बच्चों की संख्या 1,71,570 है, जबकि 37,695 बच्चे कम लंबाई वाले हैं। इसके अलावा, 1,11,862 बच्चों का वज़न कम है। आदिवासियों में पांच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों की संख्या ज़्यादा है। सरकार का दावा है कि गर्भवती महिलाओं को न सिर्फ़ पौष्टिक खाना, सरकारी मदद, बल्कि हेल्थ डिपार्टमेंट की तरफ़ से पूरी देखरेख भी दी जाती है।
दूसरी तरफ़, विपक्ष का कहना है कि अगर सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं मिलकर कोशिश कर रही हैं, तो सवाल यह है कि कुपोषण पर कंट्रोल क्यों नहीं हो रहा है। इसके अलावा, भ्रष्ट और करप्ट अधिकारी सरकारी योजनाओं से फ़ायदा उठा रहे हैं। असल में, सरकारी योजनाओं का फ़ायदा दूर-दराज़ के इलाकों तक नहीं पहुंचा है, जिसकी वजह से कुपोषण की समस्या चिंता का विषय बनती जा रही है।
गुजरात में एनीमिया आदिवासी इलाकों में फैल गया है। एनीमिया होने पर क्रोमोसोमल डिफेक्ट की वजह से शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे बच्चे की ग्रोथ रुक जाती है। यह एक हेरेडिटरी बीमारी है। अगर माता-पिता को एनीमिया है, तो बच्चे में यह बीमारी होने का चांस बढ़ जाता है। अभी, आदिवासी महिलाओं का इलाज न्यूट्रिशनल रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम, मदर्स एनकैप्सुलेटेड इन्फेक्शन प्रोग्राम और एनीमिया-फ्री इंडिया जैसी स्कीमों के तहत किया जा रहा है, जबकि केंद्र सरकार के डेटा के मुताबिक गुजरात में 15 से 49 साल की 78 परसेंट आदिवासी महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं।










