गुजरात में MANREGA के तहत, मज़दूरों को साल में सिर्फ़ 42 दिन काम दिया जाता था, जबकि 100 दिन की ‘गारंटी’ थी।

MANREGA स्कीम इस मकसद से लागू की गई थी कि काम के अधिकार वाले गरीब मज़दूरों को 100 दिन का रोज़गार दिया जा सके। एक तस्वीर सामने आई है कि MANREGA का असली मकसद ही भुला दिया गया है। इसकी वजह यह है कि गुजरात में गरीब परिवारों को साल में सिर्फ़ 42 से 49 दिन ही रोज़गार मिल पाया है। गुजरात के अलावा दूसरे राज्यों में इस स्कीम के तहत मज़दूरों को ज़्यादा दिन का रोज़गार मिला है।

साल 2005 में देश में नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट लागू किया गया था। इस स्कीम का मकसद गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को 100 दिन का रोज़गार देना था। MANREGA के ज़रिए गरीब मज़दूरों को सड़क, जल संरक्षण, तालाब की खुदाई, बागवानी और कम्युनिटी डेवलपमेंट के काम करके दिहाड़ी देकर रोज़गार दिया जाता है। MGNREGA स्कीम ने ग्रामीण इलाकों में माइग्रेशन रोकने में अहम भूमिका निभाई है। लेकिन, गुजरात में MGNREGA स्कीम पैसे कमाने की स्कीम बनती जा रही है क्योंकि मंत्रियों के बेटों से लेकर सरकारी अधिकारियों तक, भ्रष्ट अधिकारियों ने लाखों-करोड़ों का गबन किया है। MANREGA का काम पूरा हुए बिना ही लाखों-करोड़ों रुपये का पेमेंट बेनिफिशियरी को कर दिया गया है।

अब यह बात सामने आई है कि सरकार गुजरात में 100 दिन का पक्का रोज़गार देने का अपना वादा पूरा नहीं कर पाई है। गुजरात में गरीब मज़दूरों को पूरे साल में सिर्फ़ 45 से 49 दिन ही काम मिला है।

केंद्र सरकार ने खुद माना है कि गरीब मज़दूरों को ज़्यादा दिन काम देने में दूसरे राज्य गुजरात से आगे रहे हैं, जैसे त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य में, जहाँ मज़दूरों को साल में 72 दिन काम दिया गया। मिज़ोरम में 100 दिन में से 92 दिन काम दिया जा रहा है। केरल में 63, मेघालय में 71, मध्य प्रदेश में 61, राजस्थान में 56 और ओडिशा में 55 दिन काम दिया गया है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने अब MANREGA का नाम बदलकर पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना कर दिया है। इतना ही नहीं, अब इस योजना के जरिए मजदूरों को 100 दिन नहीं बल्कि 125 दिन काम देने का फैसला किया गया है। इस तरह गुजरात में MANREGA का मूल मकसद पूरा नहीं हो पाया है।

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Author: vatsalyanews

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