वोट लेते समय ‘माता-पिता’ और जीतने के बाद ‘आप कौन हैं?’:

डेमोक्रेसी की सबसे बड़ी अजीब बात यह है कि जो नेता चुनाव से पहले वोटर्स के पैर पकड़ने में नहीं हिचकिचाते, वही नेता सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही साहेब बन जाते हैं। आज पॉलिटिक्स में बस एक ही नज़रिया है – “वोट मिल गए, अब जनता की ज़रूरत नहीं।”

जब कोई आम आदमी अपनी बेसिक प्रॉब्लम जैसे पानी, सीवेज या सड़क लेकर पब्लिक रिप्रेजेंटेटिव के पास जाता है, तो उसे जो अनुभव होता है, वह बेइज्ज़ती वाला होता है। जब कोई गरीब आदमी अपनी नौकरी छोड़कर अपनी प्रॉब्लम बताने जाता है, तो उसे घंटों ऑफिस के बाहर बैठाया जाता है। आखिर में PA आकर कहता है, “सर, आप गांधीनगर गए हैं” या “सर, आप अभी किसी ज़रूरी मीटिंग या प्रोग्राम में हैं, बाद में आइए।” क्या वोटर्स ने आपको मीटिंग करने के लिए चुना था या अपनी प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए?

आज के नेताओं को जनता के पसीने की महक नहीं, बल्कि हरटोरा की खुशबू पसंद है। सोशल मीडिया पर देखो, तो लगता है कि रामराज्य आ गया है – रोज़ उद्घाटन, सम्मान समारोह और बड़ी-बड़ी बातें! लेकिन ज़मीनी हकीकत ये है कि तस्वीरों में चमकते ‘डेवलपमेंट’ के पीछे लोगों की ‘पीड़ा’ दबी हुई है। नेताजी कैमरे को देखकर मुस्कुराते हैं और पीछे खड़ी जनता रोती है। नेताओं को भ्रम है कि जनता डरपोक है या भुलक्कड़। लेकिन सच तो ये है कि अभी लोगों में एक छिपा हुआ गुस्सा उबल रहा है। जो जनता आपको पालकी में बिठाकर सत्ता के महल तक पहुंचा सकती है, वही जनता वक्त आने पर आपको वहां से नीचे उतारने की ताकत भी रखती है।

आज भले ही नेता जनता की आवाज़ सुनने के लिए खिड़कियां-दरवाजे बंद रखें, लेकिन आने वाले चुनावों में जब जनता EVM से इसी अनदेखी का जवाब देगी, तो नेताओं को समझ आ जाएगा कि डेमोक्रेसी में असली बॉस बॉस नहीं, बल्कि नागरिक होता है।

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Author: vatsalyanews

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