गुजरात में SIR के दौरान Form No. 7 का गलत इस्तेमाल करके वोटर्स के नाम कम करने का स्कैम!!!

गुजरात में चल रहे SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रोसेस के दौरान वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों के गंभीर आरोप सामने आए हैं। इस बात पर विवाद गरमा गया है कि फॉर्म नंबर 7 का गलत इस्तेमाल करके हजारों वोटरों की संख्या बेवजह कम की जा रही है। इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक पार्टियां, सामाजिक कार्यकर्ता और सिविल सोसाइटी संगठन चुनाव आयोग के सामने कड़ा विरोध दर्ज करा रहे हैं।

फॉर्म नंबर 7 क्या है?

फॉर्म नंबर 7 का इस्तेमाल वोटर लिस्ट रिवीजन प्रोसेस में वोटरों के नाम हटाने के लिए किया जाता है। आमतौर पर यह फॉर्म मौत, माइग्रेशन, डुप्लीकेट रजिस्ट्रेशन या वोटर के अयोग्य होने जैसे कारणों से भरा जाता है। कानून के मुताबिक, फॉर्म नंबर 7 भरने के बाद संबंधित वोटर को नोटिस दिया जाना चाहिए और जांच के बाद ही नाम हटाने की कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन मौजूदा SIR के दौरान आरोप लगे हैं कि इस प्रोसेस का बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल किया जा रहा है।

कैसे सामने आया स्कैम?
राज्य के कई जिलों में वोटरों को अचानक पता चला कि उनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। कई लोगों ने बताया कि उन्होंने कभी Form No. 7 भरा ही नहीं, फिर भी उनके नाम “माइग्रेटेड” या “डेड” दिखाकर हटा दिए गए हैं। सोशल एक्टिविस्ट के मुताबिक, कुछ इलाकों में Form No. 7 बल्क में अपलोड किए गए हैं। शक है कि यह गड़बड़ी लोकल लेवल पर काम करने वाले BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) या पॉलिटिकल असर में काम करने वाले लोगों ने की है।

किसे टारगेट किया जा रहा है?

यह स्कैम खास तौर पर शहरी झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों के वोटरों, माइग्रेंट मजदूरों, माइनॉरिटी और दलित कम्युनिटी के वोटरों, युवाओं और पहली बार वोट देने वालों को टारगेट कर रहा है।

आरोप हैं कि वोटरों के नाम काफी हद तक कम कर दिए गए हैं। विपक्षी पार्टियों का कहना है कि यह एक खास क्लास के वोटिंग राइट्स को खत्म करने की सोची-समझी साज़िश है।

पॉलिटिकल गरमागरमी..

इस मुद्दे पर राज्य की पॉलिटिक्स गरमा गई है। विपक्ष ने इस स्कैम को “वोटों में धांधली का नया तरीका” बताया है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी समेत कई पार्टियों ने इलेक्शन कमीशन में लिखित शिकायत दर्ज कराई है और SIR प्रोसेस को तुरंत रोकने की मांग की है। विपक्ष के नेताओं ने कहा, “अगर बैलेट बॉक्स से छेड़छाड़ मुमकिन नहीं है, तो अब वोटर लिस्ट से छेड़छाड़ की जा रही है। फॉर्म नंबर 7 अब डेमोक्रेसी के लिए सबसे बड़ा हथियार बन गया है।”

इलेक्शन कमीशन की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में इलेक्शन कमीशन की ज़िम्मेदारी पर भी सवाल उठे हैं। नियमों के मुताबिक, किसी भी वोटर का नाम लिस्ट से हटाने से पहले सही जांच और पर्सनल नोटिस देना ज़रूरी है। लेकिन बड़े पैमाने पर हुई चूक से पता चलता है कि इन नियमों का पालन नहीं किया गया है।

कुछ मामलों में, वोटर्स को चुनाव से कुछ दिन पहले पता चला कि वे वोट देने के लिए अयोग्य हो गए हैं, जो डेमोक्रेटिक प्रोसेस के लिए एक गंभीर खतरा है।

सिविल सोसाइटी और कानूनी लड़ाई
नागरिक संगठनों और वकीलों ने इस मामले में हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि यह सिर्फ़ एक एडमिनिस्ट्रेटिव गलती नहीं है बल्कि संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। वोटिंग का अधिकार हर नागरिक का एक बुनियादी डेमोक्रेटिक अधिकार है। अगर यह अधिकार सिस्टमैटिक तरीके से छीना जाएगा, तो चुनावों की क्रेडिबिलिटी पर सवालिया निशान लग जाएगा।

वोटर्स के लिए क्या करना ज़रूरी है? चुनाव एक्सपर्ट वोटर्स से अपील कर रहे हैं कि वे चेक कर लें कि उनका नाम वोटर लिस्ट में है या नहीं, अगर नाम नहीं है तो तुरंत BLO को Form No. 8 के ज़रिए करेक्शन के लिए अप्लाई करें और इलेक्शन ऑफिस में लिखकर शिकायत करें, साथ ही सोशल मीडिया पर अवेयरनेस फैलाना भी ज़रूरी माना जा रहा है।

डेमोक्रेसी के लिए चेतावनी
गुजरात में सामने आए इस स्कैम को सिर्फ़ एक राज्य का मुद्दा मानना ​​ठीक नहीं होगा। अगर समय रहते सही कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में यह मॉडल देश के दूसरे राज्यों पर भी लागू हो सकता है। SIR जैसे प्रोसेस का मकसद वोटर लिस्ट को शुद्ध करना है, लेकिन अगर यही प्रोसेस वोटिंग राइट्स छीनने का ज़रिया बन जाए तो डेमोक्रेसी की नींव ही हिल जाती है।

Form No. 7 के गलत इस्तेमाल के इन गंभीर आरोपों की इंडिपेंडेंट और ट्रांसपेरेंट जांच ज़रूरी हो गई है। इलेक्शन कमीशन को भरोसा वापस लाने के लिए कड़ी कार्रवाई करनी होगी। नहीं तो, “वोटर्स की सरकार” की जगह “लिस्ट बनाने वाली सरकार” की चर्चा शुरू होने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा। लोकतंत्र सिर्फ़ वोटिंग पर ही नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष और भरोसेमंद प्रक्रिया पर भी टिका रहता है — और आज सबसे बड़ा खतरा उसी प्रक्रिया पर मंडरा रहा है।

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Author: vatsalyanews

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