बढ़ती उम्र के साथ महिलाओं के शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं। 30 की उम्र के बाद शरीर में होने वाले बदलाव हमेशा लक्षणों के रूप में सामने नहीं आते। कई बार ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल, थायरॉइड या हीमोग्लोबिन में बदलाव काफी समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के रहते हैं। यही कारण है कि उम्र बढ़ने के साथ नियमित हेल्थ चेकअप जरूरी है। हालांकि हर महिला के लिए हर टेस्ट साल में कराना जरूरी नहीं होता। जांच की जरूरत उम्र, परिवार के इतिहास, वजन, मेंस्ट्रुअल साइकिल, प्रेग्नेंसी के इतिहास पर निर्भर करती है। लेकिन डॉ. राकेश कुमार प्रसाद, सीनियर कंसल्टेंट, एंडोक्रिनोलॉजी, फोर्टिस, नोएडा बता रहे हैं कि 30 की उम्र पार कर चुकी महिलाओं को कौन कौन से टेस्ट जरूर करवाने चाहिए।
1. HbA1c और फास्टिंग ब्लड शुगर
डायबिटीज शुरुआत में अक्सर बिना स्पष्ट लक्षण के रह सकती है। ऐसे में HbA1c पिछले लगभग दो से तीन महीनों में औसत ब्लड शुगर की जानकारी देता है, जबकि फास्टिंग ब्लड शुगर उस समय ब्लड में मौजूद ग्लूकोज का लेवल बताता है। 2026 के American Diabetes Association स्टैंडर्ड के अनुसार सामान्य जोखिम वाली महिलाओं में डायबिटीज की स्क्रीनिंग 35 साल की उम्र से शुरू करने की सलाह दी जाती है। इससे पहले भी अधिक वजन, परिवार में डायबिटीज, PCOS, हाई ब्लड प्रेशर या गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज का इतिहास होने पर जांच की जरूरत हो सकती है।
2. लिपिड प्रोफाइल
इसमें LDL, HDL, ट्राइग्लिसराइड और कुल कोलेस्ट्रॉल की जांच होती है। बढ़ा हुआ LDL अक्सर किसी तरह का लक्षण नहीं देता, लेकिन लंबे समय तक धमनियों में प्लाक बनने का कारण बन सकता है और हार्ट अटैक तथा स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकता है। WHO के अनुसार 2023 में बढ़ा हुआ LDL वर्ल्ड लेवल पर अनुमानित 36 लाख मौतों से जुड़ा था।
3. CBC और हीमोग्लोबिन
महिलाओं में आयरन की कमी और एनीमिया एक कॉमन प्रॉब्लम हो सकती है, खासकर जिन महिलाओं में पीरियड्स के दौरान बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होती है। CBC से हीमोग्लोबिन के साथ रेड और व्हाइट ब्लड सेल्स तथा प्लेटलेट्स की स्थिति का पता चलता है। लगातार थकान, कमजोरी, चक्कर या सांस फूलने जैसी समस्याओं में यह जांच फायदेमंद हो सकती है। वहीं जिन महिलाओं को एनीमिया की शिकायत है उन्हें फेरिटिन और आयरन प्रोफाइल जैसी जांच भी करानी चाहिए।
4. TSH
थायरॉइड हार्मोन में बदलाव महिलाओं में वजन, मासिक धर्म, एनर्जी, नींद और प्रजनन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। केवल उम्र के आधार पर हर महिला में हर साल TSH कराना आवश्यक नहीं माना जाता। लेकिन थायरॉइड की बीमारी का पारिवारिक इतिहास, मासिक धर्म में बदलाव, वजन में अचानक बदलाव, बहुत ज्यादा थकान या गर्भधारण होने पर डॉक्टर इसकी सलाह दे सकते हैं।
5. किडनी फंक्शन टेस्ट
क्रिएटिनिन और eGFR जैसी जांचें किडनी की कार्यक्षमता का आकलन करने में मदद करती हैं। खासकर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी की बीमारी या लंबे समय से कुछ दवाएं लेने वाली महिलाओं में इनकी जरूरत बढ़ जाती है। किडनी की बीमारी शुरुआती चरण में बिना लक्षण के रह सकती है, इसलिए जोखिम वाले लोगों में समय पर जांच जरूरी है।
6. लिवर फंक्शन टेस्ट
ALT, AST, बिलिरुबिन और अन्य मापदंडों से लिवर की स्थिति का प्रारंभिक आकलन किया जाता है। मोटापा, डायबिटीज, ट्राइग्लिसराइड, शराब का सेवन या कुछ दवाओं के लंबे समय तक इस्तेमाल में लिवर से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर लिवर फंक्शन की जांच के साथ आगे की जांच भी सलाह दे सकते हैं।








