दुर्घटना मुआवज़े से मेडिक्लेम की राशि नहीं काटी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना के मामलों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि भले ही दुर्घटना के शिकार व्यक्ति को अपने मेडिकल इंश्योरेंस (मेडिक्लेम) पॉलिसी से अस्पताल के खर्चों के लिए पैसे मिले हों, फिर भी उस रकम को मोटर वाहन अधिनियम (MVA) के तहत मिलने वाले दुर्घटना मुआवजे में से काटा नहीं जा सकता।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह से सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि दुर्घटना मुआवजे की गणना करते समय, मेडिक्लेम के ज़रिए मिले मेडिकल बिलों के रीइम्बर्समेंट (पैसे की वापसी) को मुआवजे में से काटा नहीं जा सकता; क्योंकि इंश्योरेंस के पैसे व्यक्ति द्वारा खुद चुकाए गए प्रीमियम के बदले मिलते हैं, जबकि दुर्घटना मुआवजा उसका कानूनी अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाला मुआवजा और मेडिक्लेम पॉलिसी के फायदे, ये दोनों बिल्कुल अलग-अलग चीज़ें हैं। कोर्ट ने यह माना कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाला मुआवजा एक वैधानिक अधिकार है, जो किसी दुर्घटना या मृत्यु के कारण उत्पन्न होता है। दूसरी ओर, मेडिक्लेम एक निजी अनुबंध (प्राइवेट कॉन्ट्रैक्ट) है। कोई भी व्यक्ति अपने जीवन की अनिश्चितताओं और भविष्य की अचानक आने वाली मेडिकल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सालों तक अपनी जेब से प्रीमियम चुकाता है, और उसके बाद ही उसे इस इंश्योरेंस का लाभ मिलता है। इसलिए, व्यक्ति द्वारा चुकाए गए प्रीमियम के बदले मिले लाभ के आधार पर, वैधानिक मुआवजे को कम नहीं किया जा सकता।

इंश्योरेंस कंपनी ने कोर्ट में यह दलील दी थी कि अगर किसी व्यक्ति ने मेडिक्लेम के ज़रिए अस्पताल के खर्चों की भरपाई कर ली है और फिर से वही रकम दुर्घटना मुआवजे के तौर पर दी जाती है, तो इसे ‘दोहरा लाभ’ (Double Benefit) माना जाएगा और एक ही नुकसान के लिए यह एक अनुचित लाभ होगा। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ‘दोहरे लाभ’ का नियम केवल तभी लागू होता है, जब दोनों भुगतान एक ही कानूनी स्रोत या एक ही क्षेत्र से किए गए हों। इस मामले में, अगर इंश्योरेंस कंपनी की दलील मान ली जाती है, तो वे लोग जो सालों से प्रीमियम चुका रहे हैं, वे अपने ही इंश्योरेंस के लाभों से वंचित रह जाएँगे। इसके अलावा, दुर्घटना करने वाले वाहन की इंश्योरेंस कंपनी को अनुचित लाभ मिलेगा, क्योंकि उसे मेडिकल खर्चों का भुगतान करने से छूट मिल जाएगी, सिर्फ इसलिए कि पीड़ित के पास अपनी खुद की मेडिक्लेम पॉलिसी थी।

आज के समय में आसमान छूते मेडिकल खर्चों पर चिंता व्यक्त करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर किसी के पास अचानक आने वाले मेडिकल खर्चों को उठाने की आर्थिक क्षमता नहीं होती है। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर देश के विभिन्न हाई कोर्ट्स द्वारा दिए गए विरोधाभासी फैसलों पर भी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि ऐसे अलग-अलग फैसले कानूनी अस्थिरता और भ्रम पैदा करते हैं। कोर्ट ने वकीलों और जजों को यह भी याद दिलाया कि कोर्ट के सामने सही कानूनी मिसालें पेश करना उनकी ज़िम्मेदारी है। यह ऐतिहासिक सिद्धांत तय करने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले को नए फैसले के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट भेज दिया है।

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