Rajat Sharma’s Blog | EC के सवाल: ज्ञानेश कुमार को जवाब तो देना पड़ेगा

चुनाव आयोग के अंदर की लड़ाई सामने आ गई। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर चुनाव आयोग को हाइजैक करने का आरोप लगा। इल्ज़ाम लगाने वाले उनके अपने साथी, दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी हैं। उनका आरोप है कि ज्ञानेश कुमार मनमर्जी से चुनाव आयोग चलाते हैं, बाकी दो आयुक्तों की सलाह नहीं सुनते, उनके फैसलों की जानकारी बाकी दोनों कमिशनर्स को मीडिया से मिलती है।

The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी शिकायत सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में 14 बार की, कैबिनेट सचिव को चिट्ठियां लिखीं लेकिन उन्हें कहीं से कोई जवाब नहीं मिला। जो आरोप लगे हैं, उनमें मोटी बात ये है कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मतभेद हैं। ज्ञानेश कुमार उनकी सलाह को तवज्जो नहीं देते। कई बार दोनों चुनाव आयुक्तों को अंधेरे में रखकर फैसले लेते हैं। संधू और विवेक जोशी का आरोप है कि चुनाव आयोग के कामकाज को centralize किया जा रहा है। सारे फैसले दिल्ली से हो रहे हैं। ग्राउंड पर काम करने वाले चुनाव आयोग के अफसरों के अधिकार छीने जा रहे हैं।

चुनाव आयोग ने अपने बयान में इन आरोपों को बेबुनियाद बताया कि आयोग में फैसले मनमाने तरीके से हो रहे हैं और दूसरे आयुक्तों की बात को नजरअंदाज किया जा रहा है। आयोग ने किसी कमिश्नर का नाम नहीं लिया लेकिन ये कहा गया कि आयोग की तरफ से जो आदेश आए, वो पूरी तरह से तय कानूनी प्रक्रिया के तहत जारी किए गए। फैसले आम सहमति से लिए जाते हैं। आयोग ने कहा, दस महीनों के कुछ इंटरनल नोट्स दिखाकर पूरे चुनाव आयोग के रोल पर सवाल उठाना उचित नहीं हैं। आयोग ने कहा कि पिछले एक साल में SIR समेत चालीस से ज्यादा चुनाव सुधार के फैसले सर्वसम्मति से किये गये।

ECINet के बारे में आयोग ने कहा कि ECINet जैसा प्लेटफॉर्म सख्त डेटा सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के तहत काम करता है। इसलिए उसकी कुछ सीमाएं हैं लेकिन EROs से कोई अधिकार नहीं छीना गया। आयोग का दावा है कि EROs और DEOs पहले की तरह वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने का काम अपने कानूनी अधिकार के तहत कर रहे हैं। ये कोई सीक्रेट नहीं है कि ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग को अपनी जागीर समझते हैं। उन्हें न तो इस बात की परवाह है कि कानूनन बाकी दोनों चुनाव आयुक्त भी उनके बराबर हैं, न ही उन्हें इस बात की परवाह है कि उनके attitude की वजह से चुनाव आयोग की खूब बदनामी हुई है। विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।

अगर दिल्ली के SIR में लाल कृष्ण आडवाणी, एस. जयशंकर, खुद सुखबीर सिंह संधू और CBI Director के नामों की चैकिंग की जाएगी, उनसे सवाल पूछे जाएंगे, तो चुनाव आयोग पर कौन भरोसा करेगा? चुनाव आयोग ने अपने बयान में जो जवाब दिया है उसमें ये बात साफ नहीं हुई कि ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग के data की command अपने चहेते अफसरों को किससे पूछकर दी? जिस command से voter list का update control होता है, उसका access limited क्यों कर दिया? ज्ञानेश कुमार ने ये भी नहीं बताया कि Form-6 में जो बदलाव हुआ वो किससे पूछकर किया?

क्या ये शर्म की बात नहीं है कि बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों को आयोग की गतिविधियों की जानकारी मीडिया से मिलती थी? मुख्य चुनाव आयुक्त का ये कहना काफी नहीं है कि सारे फैसले मिलकर होते थे। अगर फैसले मिल-बैठकर किए गए होते तो दो चुनाव आयुक्त उनके खिलाफ शिकायत क्यों करते? अंदर की लड़ाई बाहर क्यों आती? इसका जवाब ज्ञानेश कुमार को देना है। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है, राजनीतिक दलों के साथ मिलकर काम करना, निष्पक्ष चुनाव करवाना। ये हमारे लोकतंत्र की जान है। चुनाव के process पर, वोटर लिस्ट पर, SIR पर, जो भी सवाल उठे हैं, उनका जवाब अब चुनाव आयोग को नहीं, ज्ञानेश कुमार को देना होगा।

EC का विवाद: विपक्ष के डिजिटल मीडिया को मिला बारूद

चुनाव आयोग की आपसी लड़ाई सामने आई तो विपक्षी नेताओं को जैसे संजीवनी बूटी मिल गई। जो नेता चुनाव हारकर हताश, निराश बैठे थे, उन्हें मसाला मिल गया। ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे और अरविंद केजरीवाल को लगा कि ज्ञानेश कुमार ने किसी का murder किया है..और उन्हें पकड़कर जेल में डाल देना चाहिए। कुछ नेताओं को लगा कि इस बहाने विरोधी दलों के alliance को revive किया जा सकता है। कांग्रेस की समस्या नरेंद्र मोदी हैं। इसीलिए उसने कहा कि ज्ञानेश कुमार मोदी के कठपुतली हैं।

मोटी बात ये है कि इन सारे नेताओं को ये कहने का मौक़ा मिला कि उन्हें चुनाव में जनता ने नहीं हराया, वो तो इलेक्शन कमीशन की वजह से हारे। हालांकि The Indian Express की रिपोर्ट में उल्टा कहा गया है। जैसे, बंगाल में चुनाव आयोग के कारनामों से तृणमूल कांग्रेस के जितने उम्मीदवार हारे, लगभग उतने ही बीजेपी के भी हारे। सवाल ये भी पूछा जाएगा कि जिस कांग्रेस ने सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किये जाने पर सवाल उठाए थे, आज वो उसके hero कैसे हो गए? लेकिन अब जो नया narrative खड़ा हुआ है, डिजिटल मीडिया की जंग को जो बारूद मिला है, वो काफी दिन तक शोर मचाने के काम आएगा।

यूपी चुनाव: क्या योगी कैंपेन में विपक्ष से आगे निकले?

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव आजकल रोज नए नए चुनावी वादे कर रहे हैं। आज रायबरेली के बछरावां से पीडीए रथयात्रा शुरू की। रायबरेली राहुल गांधी का संसदीय क्षेत्र है। कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी का गठबंधन है लेकिन अखिलेश  ने रथयात्रा शुरू करने से पहले न राहुल गांधी से पूछा, न उन्हें बुलाया। कांग्रेस के नेताओं को ये बात बुरी लगी। सांसद इमरान मसूद ने कहा कि अखिलेश यादव रायबरेली से यात्रा शुरू कर रहे हैं, लेकिन वे याद रखें कि साइकिल का हैंडल पकड़ने के लिए हाथ की जरूरत होती है। इमरान मसूद ने कहा कि अगर किसी नेता को ये गलतफहमी है कि वो अकेले बीजेपी को हरा सकता है तो उसका हाल वैसा ही होगा, जैसा ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल का हुआ।

बसपा प्रमुख मायावती सक्रिय हुईं। उन्होंने ऐलान कर दिया कि बसपा यूपी, उत्तराखंड और पंजाब में अकेले चुनाव लड़ेगी। मायावती ने अपने दूसरे भतीजे ईशान आनंद को पार्टी का नेशनल कॉर्डिनेटर बना दिया। मायावती हों या अखिलेश, चुनाव से पहले अपना घर संभालने में लगे हैं लेकिन सीएम योगी आदित्यनाथ की रणनीति बिल्कुल अलग है। योगी लगातार नौकरियों के नियुक्ति पत्र बांट रहे हैं, नई स्कीम्स का एलान कर रहे हैं, और इसी बहाने विरोधियों पर वार भी कर रहे हैं। योगी ने उत्तरप्रदेश में भारत टैक्सी एप लॉन्च किया। इसके बाद कृषक समृद्धि योजना का पोर्टल और सेतु ऐप की भी शुरुआत की। किसानों को लोन के चैक सौंपे, ड्राइवर्स को टैक्सी के सर्टिफिकेट दिए और भारत टैक्सी को हरी झंडी दिखाने के बाद उसमें सवार भी हुए।

योगी आदित्यनाथ taxi drivers को हरी झंडी दिखा रहे हैं, किसानों को loan दे रहे हैं, निय़ुक्त पत्र बांट रहे हैं लेकिन ये सब करते-करते वह लोगों को पुराने ज़माने की याद दिलाना नहीं भूलते। अखिलेश यादव ने भी अब लोगों को मकान बनवाने और रोज़गार दिलवाने का वादा करना शुरू किया है पर कांग्रेस से alliance उनके रास्ते में speed breaker बना हुआ है। जहां तक मायावती का सवाल है, वो तो अभी भी अपने परिवार के चक्कर में फंसी हैं। सारा ज़ोर इस बात पर है कि कौन उनके साथ बैठेगा, किसे बोलने का मौका मिलेगा। मायावती को ये समझना पड़ेगा कि अब ज़माना बदल चुका है। अब उन्हें घर से बाहर निकलकर लोगों के बीच जाना पड़ेगा।

रामदेव: मेरी सेहत बिल्कुल ठीक है, झूठी बातें मत फैलाओ

योगगुरु स्वामी रामदेव कल बहुत नाराज थे। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिन से उनके खिलाफ तरह तरह के झूठे प्रचार किए जा रहे हैं। कभी कोई उनकी सेहत को लेकर अफवाह फैलाता है, कभी उनके ऑपरेशन के दावे किए जाते हैं, कोई पतंजलि घी की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है, ये ठीक नहीं है। स्वामी रामदेव ने कहा कि उन्होंने योग और आयुर्वेद को पूरी दुनिया में फिर से पहचान दिलाई है, बड़ी विदेशी कंपनियों की दुकानें बंद करा दी, इसलिए उनके खिलाफ साजिश हो रही है। स्वामी रामदेव ने कहा कि उनका कोई ऑपरेशन नहीं हुआ, उनका दिल, दिमाग, लीवर, किडनी सब ठीक है। दावा किया कि उनके घुटने भी अगले सौ साल तक ठीक रहेंगे, इसलिए वो न तो अफवाहें फैलाने वालों के सामने झुकेंगे, न स्वदेशी का अभियान रोकेंगे।

स्वामी रामदेव को लेकर सोशल मीडिया पर रोज-रोज तरह-तरह की बातें देखने-सुनने को मिलती हैं। कोई उन्हें बीमार बताता है, AIIMS में इलाज करवाते दिखाता है। ये सब दिखाने वाले ये भी नहीं सोचते कि हर सुबह बिला नागा स्वामी रामदेव India TV पर live योग show करते दिखाई देते हैं। पतंजलि के products को लेकर भी कैम्पेन चलाए जाते हैं। ये बात समझ में आती है क्योंकि स्वामी रामदेव ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को टक्कर दी है और कारोबार में इस तरह की rivalry तो होती है लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि स्वामी रामदेव ने योग विद्या को घर-घर पहुंचाने के लिए बहुत परिश्रम किया।

स्वामी रामदेव ने व्यापार में भी सफलता हासिल की लेकिन अगर वो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा गरीब बच्चों को शिक्षा देने में, संस्कार देने में, वेद पुराण पढ़ाने में, सनातन के प्रचार-प्रसार में लगाते हैं तो इसकी तारीफ होनी चाहिए।

देखें: ‘आज की बात, रजत शर्मा के साथ’ 23 सितंबर, 2026 का पूरा एपिसोड

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Author: vatsalyanews

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